भारतीय अंतरिक्ष तकनीकी क्षेत्र में बढ़ते निजी करण के समक्ष चुनौतियां एवं लाभ

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इसरो

नई दिल्ली (अभिषेक यादव, दिल्ली से रिपोर्ट) : हाल ही में भारतीय सरकार के मंत्रिमंडल द्वारा भारतीय अंतरिक्ष तकनीक (Indian Space Technology) के क्षेत्र में निजीकरण (Privatization) को बढ़ावा देने का फैसला लिया गया है जिसकी उद्घोषणा इसरो प्रमुख के सिवन के द्वारा बीते दिनों की गई है, हालांकि पिछले कई दशकों से भारतीय अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में निजी क्षेत्रों की भागीदारी अहम रही है, किंतु विकसित देशों के अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में बढ़ते निजी क्षेत्रों की भूमिका एवं लाभ को देखते हुए सरकार ने अंतरिक्ष तकनीक क्षेत्र में निजीकरण को बढ़ावा देने का फैसला लिया है।

निजी क्षेत्रों की बढ़ती भूमिकाओं से प्राप्त होने वाले लाभ:

किसी भी क्षेत्र में निजीकरण को बढ़ावा देने से सर्वप्रथम उस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिलता है जिसके परिणाम स्वरुप क्षेत्र की उत्पादकता एवं गुणवत्ता में व्यापक सुधार होता है जो कि हमें अमेरिका के निजी क्षेत्र की एजेंसी स्पेसएक्स के आने से दिखाई देने को भी मिलता है , इसके साथ ही आर्थिक संकट भी समाप्त हो जाता है जिसके फलस्वरूप नए, योग्य कर्मचारियों की भर्ती की जा सकती है तथा कम समय में ही ज्यादा मिशनों (Missions) को अंजाम दिया जा सकता है जिससे अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में नए आयामों को बढ़ावा मिलेगा, साथ ही इसके प्रबंधन एवं वाणिज्यीकरण (Commercialization) को भी बढ़ावा मिलेगा।
साथ ही साथ सरकार के ऊपर आर्थिक बोझ में भी कमी आएगी जिसके फलस्वरूप वार्षिक बजट घाटे को कम करने के लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद मिलेगी!

निजीकरण से उत्पन्न होने वाली चुनौतियां: 

आपको बता दें कि निजीकरण के परिणाम स्वरुप सर्वप्रथम चुनौती एक नए प्रशासनिक ढांचे के निर्माण की है जो निजी कंपनियों एवं इसरो के बीच समन्वय स्थापित कर इसे सुचारू रूप से क्रियान्वित कर सकें, इसके साथ ही पहले से ही निजी कंपनियों के साथ किए गए समझौतों की पूर्वावलोकन की आवश्यकता पड़ेगी जो एक गंभीर चुनौती प्रतीत हो रही है।

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